Wednesday, 15 October 2014

मेरी सुबह








मेरी सुबह 



कल सुबह पटाखे में 
एक चिड़िया मर गई थी , 
उसके मरते ही शायद 
कुछ यादें जी उठीं थीं ,


यादें बस उन्ही सुबहों की 
जो मेरे खुशनसीब बचपन में थीं ,
आज के अलार्म की जगह 
तब चिड़िया मुझे जगाती थी ,


हर रोज़ उसी वक्त मेरी 
नींद खुल जाती थी ,
मानो वे चिड़िया मुझे जगाने को 
खुद जल्दी जाग जाती थीं ,


अब भी चिड़िया उसी वक्त जाग जाती हैं 
पर अब नींद नहीं खुलती ,
क्योंकि अब चिड़ियाँ कम हैं 
पहले कुछ ज्यादा थीं ,


अब बचा नहीं कुछ मेरे पास 
बस एक अफ़सोस है ,
कि कल सुबह पटाखे में 
एक चिड़िया मर गई थी ,


मैंने तो वो मरते देखी 
पर न जाने कितनी मार दी हमने ,
मज़े मज़े में न जाने 
कितनी ज़िंदगियाँ छीन ली हमने ,


फूटा एक पटाखा 
और निकला कुछ धुँआ ,
उड़ गया जब हुआ महसूस  
कि शायद कुछ नहीं हुआ ,


बदबूदार धुँआ मिल गया हवा में 
हवा से मिल गया वो चिड़िया के लहू में ,
कि अब फिर नज़ारा देखो
गिरने लगी एक और चिड़िया मौत के मुँह में ,


वो दिन थे कुछ कल के 
चिड़ियाँ सारी प्रदूषण से मार दी गईं हैं ,
ये दिन हैं कुछ आज के 
शायद मेरी सुबह भी चिड़िया के साथ मर गई है ,



शान्तनु पुरोहित 






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