मेरी सुबह
कल सुबह पटाखे में
एक चिड़िया मर गई थी ,
उसके मरते ही शायद
कुछ यादें जी उठीं थीं ,
यादें बस उन्ही सुबहों की
जो मेरे खुशनसीब बचपन में थीं ,
आज के अलार्म की जगह
तब चिड़िया मुझे जगाती थी ,
हर रोज़ उसी वक्त मेरी
नींद खुल जाती थी ,
मानो वे चिड़िया मुझे जगाने को
खुद जल्दी जाग जाती थीं ,
अब भी चिड़िया उसी वक्त जाग जाती हैं
पर अब नींद नहीं खुलती ,
क्योंकि अब चिड़ियाँ कम हैं
पहले कुछ ज्यादा थीं ,
अब बचा नहीं कुछ मेरे पास
बस एक अफ़सोस है ,
कि कल सुबह पटाखे में
एक चिड़िया मर गई थी ,
मैंने तो वो मरते देखी
पर न जाने कितनी मार दी हमने ,
मज़े मज़े में न जाने
कितनी ज़िंदगियाँ छीन ली हमने ,
फूटा एक पटाखा
और निकला कुछ धुँआ ,
उड़ गया जब हुआ महसूस
कि शायद कुछ नहीं हुआ ,
बदबूदार धुँआ मिल गया हवा में
हवा से मिल गया वो चिड़िया के लहू में ,
कि अब फिर नज़ारा देखो
गिरने लगी एक और चिड़िया मौत के मुँह में ,
वो दिन थे कुछ कल के
चिड़ियाँ सारी प्रदूषण से मार दी गईं हैं ,
ये दिन हैं कुछ आज के
शायद मेरी सुबह भी चिड़िया के साथ मर गई है ,
शान्तनु पुरोहित

No comments:
Post a Comment