Tuesday, 8 March 2016

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर 


आज़ादी के ६५ वर्ष बाद भी यदि हमारा समाज लैंगिक भेदभाव को आत्मसात किये हुए है तो यह बहुत दुःख की बात है। पुरानी व्यवस्था में जहाँ महिला को एक संपत्ति समझा जाता था वह आज भी थोड़े बहुत सुधार के साथ हमारी सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त है। एक समय था जब सामाजिक ग्राम पंचायतें जिनमें बाहुबली सरपंच हुआ करते थे उनके सामने पर्दा प्रथा तथा अन्य शोषणकारी परम्पराओं के खिलाफ आवाज़ उठाना सुरक्षित नहीं होता था जो आज भी प्रायः देखने में आता रहता है। दूर दराज के देहाती इलाकों में कोई पंचायत के निर्णय को मानने से इंकार करता है तो उसे सामाजिक बहिष्कार से लेकर शारीरिक कष्ट जैंसे दंड भी भुगतने होते हैं। यदि सामाजिक रूप से अति पिछड़े क्षेत्रों को भी छोड़ दिया जाये तो शहरी इलाकों में भी महिला को एक व्यक्ति न समझकर एक संपत्ति मानने का मानसिक विकार लोगों के मस्तिष्क में भरा हुआ है।
देश की आधी आबादी को कष्ट देने वाली इस विचारधारा की जड़ कहाँ है ?
यदि कोई व्यक्ति शास्त्रीय सन्दर्भों को इसका दोष देता है तो वह पूरी  सही नहीं है।मनुस्मृती एवं चाणक्यनीति जैंसे शास्त्रों में नारी की जिन प्रवृत्तिगत विशेषताओं का वर्णन है वे मात्र पुरुष के द्वारा महिला के साथ किये जाने वाले व्यहार  में कुछ सावधानियां या हिदायतें हैं। जो नारी के आदतन व्यव्हार को प्रदार्शित करती हैं। उनमें कहीं कहीं निंदापूर्ण भाषा का उपयोग किया गया है जिसमें बात पर जोर देने की भावना ही निहित है।सनातन संस्कृति ऊपर से अध्ययन करने पर महिलाओं की शोषणकारी अवश्य प्रतीत होती है परन्तु ऐंसा वास्तव में है नहीं। 
                          
                             यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
                                                यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।-अथर्ववेद 


जिस परंपरा में महिलाओं के सम्मान को एक परंपरा ही नहीं वरन एक कठोर नियम की तरह स्वीकार किया गया है उसका पालन करने वाले लोग यदि धर्म का हवाला देकर सामाजिक असमानता को बढ़वा दे रहे हैं तो कहीं से कहीं तक यह नहीं माना जा सकता कि वे भारतीय संस्कृति का पालन कर रहे हैं। वे उस सामंतवादी व्यवस्था में जी रहे हैं जो एक समय भारत के पतन का मूल कारण रही है।यहाँ तक कि हमारी पुरातन परंपरा में जब कोई नारी अपने हाथ में तिनका पकड़ कर अपने किसी अपराध को स्वीकार कर लेती थी तो उसे उस अपराध का दंड नहीं दिया जा सकता था। ये प्रावधान सिद्ध करते हैं कि पुरातन वैदिक व्यवस्था में महिला के प्रति कितना सम्मान होता था। आज उसी व्यवस्था के पालन को स्वीकार करने वाले हम लोग उसका कितना पालन कर रहे हैं ये दिखाई दे रहा है। कहा जाता है कि एक पुरुष को शिक्षित किया जाये तो एक ही परुष को शिक्षित किया जाता है परन्तु एक महिला को शिक्षित करना २ परिवारों को ३ पीढ़ियों को शिक्षित करना है। पितृसत्तात्मक समाज के साथ अनेक स्थानों पर शासन में महिलाओं के योगदान के भी उदारहण  हैं।महिला का क्या मूल्य है ? उसे कितना सम्मान दिया जाना चाहिए इस तरह की अवधारणाओं से सिद्ध हो जाता है और ये कहीं और की नहीं प्राचीन भारतीय दर्शन की अवधारणाएँ हैं। वैधानिक रूप से भी कई व्यवस्थाएं की गयी हैं जिनका यथोचित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाया है। 
७३वे संविधान संशोधन में महिलाओं के लिए ग्राम सभाओं में आरक्षण का प्रावधान किया गया। महिलाऐं सरपंच पंच इत्यादि बनने लगीं ,यह एक अच्छी बात थी। परन्तु साथ में एक नयी परंपरा ने जन्म ले लिया जिसे हम सरपंच पति कल्चर के नाम से जानते हैं। यानि कहने को तो महिला सरपंच बन गयी लेकिन सरपंच के समस्त उत्तरदायित्व उसके पति या देवर के हाथों में आ गए। क्या सरपंच होना या न होने में कोई ज्यादा अंतर था ? 
इस प्रावधान का लाभ महिलाओं को उतनी सक्रियता नहीं दिला पाया जितना चाहा गया था। इसका कारण क्या था ? प्रावधान कर दिया गया वो एक आवश्यकता थी परन्तु क्या हमारे सामाजिक चरित्र में कोई बदलाव आया ? नहीं।  और यही वो कारण था जिससे प्रावधान का यथेष्ठ लाभ प्राप्त नहीं हो पाया।
ये दर्शता है कि जब तक समाज स्वयं सामंतवादी व्यवस्था का उन्मूलन नहीं कर लेता तब तक लैंगिक असमानता को पाटा नहीं जा सकता।ऐंसे में यह आवश्यक हो जाता है कि समाज वास्तविक भारतीय परंपरा और उसके प्रावधानों को समझे। इससे यह समझने में सहायता मिलेगी की हम कहाँ जा रहे है और हमें कहाँ लौटने की आवश्यकता है ?  

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