Monday, 7 October 2019

बिग बॉस पर विवाद

आज #bigboss_ko_ban करने को लेकर समाज का एक बहुत बड़ा तबका विरोधरत है परन्तु सोचने वाली बात यह है कि इतने समय से वह जो कुछ भी दिखा रहा था क्या वह पहले भी सही था?
पैसा कमाने और लोगों की जीवन शैली में बदलाव लाकर अपनी तथाकथित उदार विचारधारा का प्रचार प्रसार करके अपने उत्पादों की मार्केट रीच बढ़ाने के लिए बॉलीवुड एक अचूक उपाय के रूप में उभरा है। जाने अनजाने में एक अपेक्षाकृत अपरिपक्व और कम जागरूक दर्शक उसके प्रभाव में आ जाता है। उसके जीवन में वहीं सिद्धांत एवम् विचार रच बस जाते हैं जो टीवी पर दिखाए जा रहे हैं। क्या आपने लोगों को किसी विशिष्ट फिल्म में दर्शाए का रहे संवाद, अभिनय, केश विन्यास(हेयर स्टाइल) या हाव भाव की नकल करके व्यवहार में उतारते नहीं देखा?

याद कीजिए एक पोर्न स्टार सनी लियोनी को भी बॉलीवुड में इसी शो के साथ लॉन्च किया गया था। फिर एक शॉर्ट फिल्म भी आयी थी जिसमे एक लड़की अपने माता पिता से कहती है कि वो सनी लियोन बनना चाहती है उसके माता पिता के साथ उसके संवाद को भी दिखाया गया है और दिखाया गया है कि उसके माता पिता उसके साथ वितंडा में हर जाते हैं उनके विचार उस लड़की के समक्ष तर्कहीन सिद्ध हो जाते हैं।

इसमें साफ साफ समझ में आता है कि पोर्न फिल्म्स के लिए भारत में मार्केट बनाने के लिए यह एक सक्रिय वैचारिक प्रयास था।
ये षड्यंत्र बहुत सोच समझकर चलाया जा रहा है बिग बॉस इसका मात्र एक अंश भर है। पैसा कमाने के लिए ये लोग सब करेंगे हमारी परंपरा और संस्कृति सबके साथ खिलवाड़ करेंगे।

सेंसर बोर्ड फिल्म पर कांट छांट करके प्रयास करता है कि इस सब को नियंत्रित किया का सके पर वह भी उतना सफल नहीं हो पाता।
सूचना तकनीक के विस्तार के साथ अब एक नया तरीका आ गया है वेब सीरीज जहां रोक लगा पाना भी इतना पेचीदा है कि हम भी सोच भी नहीं सकते। यहां कौन से विचारों का, कब, कौन, कैसे प्रचार प्रसार कर दे कोई गारेंटी नहीं है।

समाज की कर्णधार पीढ़ी जिसे भारतीय जीवन मूल्यों का ज्ञान नहीं है वह Bigboos और अन्य धारावाहिकों में दिखाए जा रहे पात्रों  से प्रभावित होकर उन्हें रोल मॉडल बना लेती है। जरा सोचिए जब लोग इनसे प्रेरणा लेंगे तो आने वाले समय में भारतीय समाज की क्या दुर्दशा करेंगे। ऐसी स्थिति में जो लोग समझदार हैं ये उनका दायित्व बनता है कि टीवी पर दिखाए जा रहे कुसंस्कारी कृत्यों को  भारतीय समाज के लोक प्रचलन में आने से रोकें एवं इसका एक ही उपाय है विरोध और अधिक से अधिक विरोध। ताकि कोई भी व्यक्ति और कोई भी कलाकार अपने क्षुद्र व्यवसायिक स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए भारतीय समाज की जड़ों के साथ खेलने का दुस्साहस न करे ऐसा करने से पूर्व वह बारंबार सोचे।

और अंत में उदाहरण के लिए.. हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि भारत की पुरातन संयुक्त पारिवारिक  व्यवस्था पर टीवी में लंबे समय से दिखाए जा रहे धारावाहिकों ने कितना दुष्प्रभाव डाला है।
संभवतः विषय को समझने के लिए यह उदाहरण पर्याप्त है।

भारत माता की जय
वन्दे मातरम्।

Tuesday, 25 April 2017

आंदोलन बना आतंक

पश्चिम बंगाल का नक्सलबाड़ी 1967 में शोषितों का सामंत शोषकों के खिलाफ आंदोलन सारी दुनिया के लिए एक मिसाल बना था । राज्य में कम्युनिस्ट सरकार आने के बाद अन्य राज्यों में भी फैला । कभी एक गाँव से शुरू हुआ ये आंदोलन आज आतंक का पर्याय बन चुका है । सुकमा में हमारे 25 जवानों पर कायरना हमला कोई नई घटना नहीं है । नक्सलबाड़ी आंदोलन के उस समय के जीवित नेता भी क्रांति के इस तरीके व आंदोलन की इस मतिभ्रष्टता से दुखी हैं ।
शहरों के अंदर के कॉलेज विद्यार्थी तक इनके बहकावे में आ रहे हैं कॉमरेड बन रहे हैं । आदिवासी क्षेत्रों के गरीबों में इनका अच्छा खासा प्रभाव है । इनके नेता भली भांति शिक्षित हैं जो अशिक्षित गरीब आदिवासियों को भड़काते हैं । संगठन के विस्तार में इन्हे अशिक्षित आदिवासियों की अनभिज्ञताओं का लाभ मिलता है । शहरों में पढे लिखे बेरोजगार और स्वयं को उपेक्षित महसूस करने वाले अवसादग्रस्त युवा समाज और शासन तंत्र से प्रतिशोध लेने के विचार से इनके झांसे में आ जाते हैं ।
राष्ट्र के भीतर ही राष्ट्र विरोधी मानसिकता व सशस्त्र विद्रोही राष्ट्र के लिए कैंसर हैं । इस रोग को समाप्त करने का एक ही उपाय है की बीमारी जड़ को समाप्त करना होगा । सशस्त्र विद्रोहियों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ना होगा ,जैसे भी संभव हो विश्वविद्यालयों में सक्रिय इनके तंत्र को जड़ से मिटाना होगा ,अपने गिरिवासी वनवासी वंचित वनबंधुओं को शिक्षित करना होगा और अंततः कुछ लोगों की सामंतवादी मानसिकता को समाप्त करना होगा जो इस आंदोलन की मूल उद्दीपक थी ।





Wednesday, 8 February 2017

सुभाष एक उद्घोष

सुभाष जो है क्रांति
सुभाष एक वीरव्रत
सुभाष जिसका दृढ़ निश्चय
सुभाष एक रिपुमर्दन

सुभाष कोई प्यासा
सुभाष एक जुनून
सुभाष जिसका तीक्ष्ण तर्क
सुभाष एक विद्रोह

सुभाष जो है तूफान
सुभाष कोई निडर
सुभाष जिसका प्रचंड तेज
सुभाष एक आक्रमण

सुभाष जो था उम्मीद
सुभाष एक संगठक
सुभाष जिसका अनंत अभियान
सुभाष एक कूटनीतिज्ञ

सुभाष एक पदचिह्न
सुभाष एक राष्ट्रप्रेम
सुभाष जिसकी तीव्र उत्कंठा
सुभाष एक भूमिपुत्र


Tuesday, 8 March 2016

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर 


आज़ादी के ६५ वर्ष बाद भी यदि हमारा समाज लैंगिक भेदभाव को आत्मसात किये हुए है तो यह बहुत दुःख की बात है। पुरानी व्यवस्था में जहाँ महिला को एक संपत्ति समझा जाता था वह आज भी थोड़े बहुत सुधार के साथ हमारी सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त है। एक समय था जब सामाजिक ग्राम पंचायतें जिनमें बाहुबली सरपंच हुआ करते थे उनके सामने पर्दा प्रथा तथा अन्य शोषणकारी परम्पराओं के खिलाफ आवाज़ उठाना सुरक्षित नहीं होता था जो आज भी प्रायः देखने में आता रहता है। दूर दराज के देहाती इलाकों में कोई पंचायत के निर्णय को मानने से इंकार करता है तो उसे सामाजिक बहिष्कार से लेकर शारीरिक कष्ट जैंसे दंड भी भुगतने होते हैं। यदि सामाजिक रूप से अति पिछड़े क्षेत्रों को भी छोड़ दिया जाये तो शहरी इलाकों में भी महिला को एक व्यक्ति न समझकर एक संपत्ति मानने का मानसिक विकार लोगों के मस्तिष्क में भरा हुआ है।
देश की आधी आबादी को कष्ट देने वाली इस विचारधारा की जड़ कहाँ है ?
यदि कोई व्यक्ति शास्त्रीय सन्दर्भों को इसका दोष देता है तो वह पूरी  सही नहीं है।मनुस्मृती एवं चाणक्यनीति जैंसे शास्त्रों में नारी की जिन प्रवृत्तिगत विशेषताओं का वर्णन है वे मात्र पुरुष के द्वारा महिला के साथ किये जाने वाले व्यहार  में कुछ सावधानियां या हिदायतें हैं। जो नारी के आदतन व्यव्हार को प्रदार्शित करती हैं। उनमें कहीं कहीं निंदापूर्ण भाषा का उपयोग किया गया है जिसमें बात पर जोर देने की भावना ही निहित है।सनातन संस्कृति ऊपर से अध्ययन करने पर महिलाओं की शोषणकारी अवश्य प्रतीत होती है परन्तु ऐंसा वास्तव में है नहीं। 
                          
                             यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
                                                यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।-अथर्ववेद 


जिस परंपरा में महिलाओं के सम्मान को एक परंपरा ही नहीं वरन एक कठोर नियम की तरह स्वीकार किया गया है उसका पालन करने वाले लोग यदि धर्म का हवाला देकर सामाजिक असमानता को बढ़वा दे रहे हैं तो कहीं से कहीं तक यह नहीं माना जा सकता कि वे भारतीय संस्कृति का पालन कर रहे हैं। वे उस सामंतवादी व्यवस्था में जी रहे हैं जो एक समय भारत के पतन का मूल कारण रही है।यहाँ तक कि हमारी पुरातन परंपरा में जब कोई नारी अपने हाथ में तिनका पकड़ कर अपने किसी अपराध को स्वीकार कर लेती थी तो उसे उस अपराध का दंड नहीं दिया जा सकता था। ये प्रावधान सिद्ध करते हैं कि पुरातन वैदिक व्यवस्था में महिला के प्रति कितना सम्मान होता था। आज उसी व्यवस्था के पालन को स्वीकार करने वाले हम लोग उसका कितना पालन कर रहे हैं ये दिखाई दे रहा है। कहा जाता है कि एक पुरुष को शिक्षित किया जाये तो एक ही परुष को शिक्षित किया जाता है परन्तु एक महिला को शिक्षित करना २ परिवारों को ३ पीढ़ियों को शिक्षित करना है। पितृसत्तात्मक समाज के साथ अनेक स्थानों पर शासन में महिलाओं के योगदान के भी उदारहण  हैं।महिला का क्या मूल्य है ? उसे कितना सम्मान दिया जाना चाहिए इस तरह की अवधारणाओं से सिद्ध हो जाता है और ये कहीं और की नहीं प्राचीन भारतीय दर्शन की अवधारणाएँ हैं। वैधानिक रूप से भी कई व्यवस्थाएं की गयी हैं जिनका यथोचित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाया है। 
७३वे संविधान संशोधन में महिलाओं के लिए ग्राम सभाओं में आरक्षण का प्रावधान किया गया। महिलाऐं सरपंच पंच इत्यादि बनने लगीं ,यह एक अच्छी बात थी। परन्तु साथ में एक नयी परंपरा ने जन्म ले लिया जिसे हम सरपंच पति कल्चर के नाम से जानते हैं। यानि कहने को तो महिला सरपंच बन गयी लेकिन सरपंच के समस्त उत्तरदायित्व उसके पति या देवर के हाथों में आ गए। क्या सरपंच होना या न होने में कोई ज्यादा अंतर था ? 
इस प्रावधान का लाभ महिलाओं को उतनी सक्रियता नहीं दिला पाया जितना चाहा गया था। इसका कारण क्या था ? प्रावधान कर दिया गया वो एक आवश्यकता थी परन्तु क्या हमारे सामाजिक चरित्र में कोई बदलाव आया ? नहीं।  और यही वो कारण था जिससे प्रावधान का यथेष्ठ लाभ प्राप्त नहीं हो पाया।
ये दर्शता है कि जब तक समाज स्वयं सामंतवादी व्यवस्था का उन्मूलन नहीं कर लेता तब तक लैंगिक असमानता को पाटा नहीं जा सकता।ऐंसे में यह आवश्यक हो जाता है कि समाज वास्तविक भारतीय परंपरा और उसके प्रावधानों को समझे। इससे यह समझने में सहायता मिलेगी की हम कहाँ जा रहे है और हमें कहाँ लौटने की आवश्यकता है ?  

Wednesday, 2 March 2016

देव पूजन से दैत्य पूजन की ओर ....


देव पूजन से दैत्य पूजन की ओर
बहुत दिनों से सुनने में आ रहा है कि कुछेक दलित संगठनों ने महिषासुर दिवस मनाना शुरू किया है।उनकी यह पहल उस प्राचीन व्यवस्था का विरोध है जो उनके पूर्वजों के अनादिकाल से चले आ रहे शोषण के लिए उत्तरदायी है।अस्पर्श्यता,भेदभाव तथा सामाजिक पिछड़ापन की जड़ इसी व्यवस्था की देन हैं।समाज अपेक्षाकृत आधुनिक होता जा रहा है।नवीन पीढ़ी कुरीतियों का पालन करने में संकोच करती है।उसे समझ में आने लगा है कि कुछेक पुरातन मान्यताऐं आज के समय में अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हैं।जो परम्पराऐं किसी समय समाज का सफल संचालन करतीं थीं उनके अमानवीय पक्षों के कारण अब कुरीतियां प्रतीत होती हैं।जिनका उन्मूलन समाज की एक मांग बन चुका है।
महिषासुर दिवस का आयोजन तथाकथित निम्न जातियों के मन में सवर्णों के प्रति भरे असंतोष का परिणाम है।इन आयोजनों का विरोध स्वाभाविक है क्योंकि जो इक्का दुक्का लोग इनका संयोजन करते हैं वे भारतीय संस्कृति को यथोचित मान्यता नहीं देते और उसपर कुठाराघात तो करते ही हैं।वे पौराणिक कथाओं को कपोल कल्पित मानते हैं तथा उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न खड़े करते हैं जो संस्कृति पर संदेह ही नहीं वरन् भारत की आत्मा को ठेस पहुँचाना भी है।
इस तरह के आयोजन करने वाले भारत की सांस्कृतिक विरासत को भारतीय मानस पटल से विस्मृत कर देना चाहते हैं।वे उस जड़ को ही समाप्त कर देना चाहते हैं जिसने उन्हे सामाजिक व्यवस्था में   अंतिम स्थान दिया है।पुरातन मान्यताओं को कौन व्यक्ति किस दृष्टिकोण से देखता है इसमें उसका अपना मत हो सकता है परन्तु किसी संस्कृति की एक कुरीति के आधार पर समस्त मान्यताओं को ही खारिज कर देना कहाँ तक सही है?जो संस्कृति देवी तथा राम कृष्ण जैसे ईश्वर चरित्रों की पूजन करती है जो कि सात्विकता यानी अच्छाई के प्रचार का एक माध्यम है उसमें राक्षसों की जयंतीयाँ मनाना तामसिकता की ओर जाने का एक संकेत तो है ही साथ ही साथ सांस्कृतिक पतन का एक परिचायक भी है।
एक बात तो तय है कि इस तरह के आयोजनों को बलपूर्वक रोकना इसका समाधान तो नहीं है।इसका उन्मूलन इसके प्रसार को रोकने में है।इसका प्रसार दलितों के मन में सवर्णो के लिए व्याप्त असंतोष की भावना में है।उस जातिय वैमनस्य को दूर करना होगा जो कि भारतीय समाज की नस नस में व्यापक है।उसे दूर करना इस बात में निहित है कि तथाकथित निम्न जातियों के साथ जो अमानवीय व्यवहार किया जाता है उसका उन्मूलन  किया जाए।लक्ष्य बहुत दूरगामी है लेकिन इस तरह के जातीय वैमनस्य को पाटने का यही एक उपाय है।
"वनवासी गिरीवासी वंचित,बंधु सहोदर हैं अपने।
उनको लेकर साथ चलें हम पूर्ण करें सबके सपने