Wednesday, 2 March 2016

आरक्षण के जातिगत आधार की समाप्त होती उपादेयता

आरक्षण के जातिगत आधार की समाप्त होती उपादेयता
हरियाणा के जाट भाइयों को बहुत बहुत धन्यवाद।आपने अपनी जाति को आरक्षण दिलाने के लिए आंदोलन चलाया।आपने हजारों करोड़ रुपये का नुकसान किया।न जाने कितनों को विधवा कितनों को अनाथ कर दिया।आपने दिखा दिया कि जातिगत आरक्षण से सिर्फ और सिर्फ हंगामे ही होने हैं और लाभ कितना हो पाया है ये तो सब देख ही रहे हैं।दलित भाईयों की स्थिति में कितना सुधार आ सका है ये भी किसी से छिपा नहीं है।संविधान में १० वर्ष के लिए प्रावधान किया गया था।देश का दुर्भाग्य कि कोई भी सरकार इतना साहस नहीं जुटा पाई कि इसे बंद कर सके।यहाँ तक कि इस पर पुनर्विचार की बात भी की जाती है तो उसके लिए भी कोई तैयार नहीं है।ये तथ्य माना जा सकता है कि आरक्षण भारत के शोषित वर्ग के उत्थान के लिए आवश्यक है लेकिन उसके लिए संघर्ष की परिणिति जब राष्ट्र की आर्थिक सामाजिक क्षति के रूप में हो तो इस व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप के औचित्य के विषय में प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है।
यदि राष्ट्र को इन प्रायः उठने वाले हिंसक संघर्षों से निजात पाना है तो इसकी जातिगत प्रष्ठभूमि को हटाना होगा।जातिगत आधार जहाँ इस तरह के संघर्ष की जड़ है वहीं इसने सामान्य वर्ग के सवर्णों के मन में दलितों के लिए वैमनस्य भी भरा है। यहाँ तक कि ये वैमनस्य सामाजिक समानता के दूरगामी लक्ष्य के रास्ते में एक रुकावट भी है।जातिगत आधार को आर्थिक आधार में बदलने से आरक्षण के प्रावधान को और अधिक तर्कसंगत बनाया जा सकता है।

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