Wednesday, 2 March 2016

देव पूजन से दैत्य पूजन की ओर ....


देव पूजन से दैत्य पूजन की ओर
बहुत दिनों से सुनने में आ रहा है कि कुछेक दलित संगठनों ने महिषासुर दिवस मनाना शुरू किया है।उनकी यह पहल उस प्राचीन व्यवस्था का विरोध है जो उनके पूर्वजों के अनादिकाल से चले आ रहे शोषण के लिए उत्तरदायी है।अस्पर्श्यता,भेदभाव तथा सामाजिक पिछड़ापन की जड़ इसी व्यवस्था की देन हैं।समाज अपेक्षाकृत आधुनिक होता जा रहा है।नवीन पीढ़ी कुरीतियों का पालन करने में संकोच करती है।उसे समझ में आने लगा है कि कुछेक पुरातन मान्यताऐं आज के समय में अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हैं।जो परम्पराऐं किसी समय समाज का सफल संचालन करतीं थीं उनके अमानवीय पक्षों के कारण अब कुरीतियां प्रतीत होती हैं।जिनका उन्मूलन समाज की एक मांग बन चुका है।
महिषासुर दिवस का आयोजन तथाकथित निम्न जातियों के मन में सवर्णों के प्रति भरे असंतोष का परिणाम है।इन आयोजनों का विरोध स्वाभाविक है क्योंकि जो इक्का दुक्का लोग इनका संयोजन करते हैं वे भारतीय संस्कृति को यथोचित मान्यता नहीं देते और उसपर कुठाराघात तो करते ही हैं।वे पौराणिक कथाओं को कपोल कल्पित मानते हैं तथा उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न खड़े करते हैं जो संस्कृति पर संदेह ही नहीं वरन् भारत की आत्मा को ठेस पहुँचाना भी है।
इस तरह के आयोजन करने वाले भारत की सांस्कृतिक विरासत को भारतीय मानस पटल से विस्मृत कर देना चाहते हैं।वे उस जड़ को ही समाप्त कर देना चाहते हैं जिसने उन्हे सामाजिक व्यवस्था में   अंतिम स्थान दिया है।पुरातन मान्यताओं को कौन व्यक्ति किस दृष्टिकोण से देखता है इसमें उसका अपना मत हो सकता है परन्तु किसी संस्कृति की एक कुरीति के आधार पर समस्त मान्यताओं को ही खारिज कर देना कहाँ तक सही है?जो संस्कृति देवी तथा राम कृष्ण जैसे ईश्वर चरित्रों की पूजन करती है जो कि सात्विकता यानी अच्छाई के प्रचार का एक माध्यम है उसमें राक्षसों की जयंतीयाँ मनाना तामसिकता की ओर जाने का एक संकेत तो है ही साथ ही साथ सांस्कृतिक पतन का एक परिचायक भी है।
एक बात तो तय है कि इस तरह के आयोजनों को बलपूर्वक रोकना इसका समाधान तो नहीं है।इसका उन्मूलन इसके प्रसार को रोकने में है।इसका प्रसार दलितों के मन में सवर्णो के लिए व्याप्त असंतोष की भावना में है।उस जातिय वैमनस्य को दूर करना होगा जो कि भारतीय समाज की नस नस में व्यापक है।उसे दूर करना इस बात में निहित है कि तथाकथित निम्न जातियों के साथ जो अमानवीय व्यवहार किया जाता है उसका उन्मूलन  किया जाए।लक्ष्य बहुत दूरगामी है लेकिन इस तरह के जातीय वैमनस्य को पाटने का यही एक उपाय है।
"वनवासी गिरीवासी वंचित,बंधु सहोदर हैं अपने।
उनको लेकर साथ चलें हम पूर्ण करें सबके सपने

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