Monday, 13 April 2015

मैंने देखा है

बिना छत की झोपड़ी में भगाई, 
बुढ़िया को क्रंदन करते  देखा है
अधेड़ आदमी की कमाई को मैंने,
बाबू की रिश्वत में लुटते देखा है

कॉलेज के बाहर विधवा को,
हाथ फैलाये भीख मांगते देखा है
गरीब बाप के बेटे को मैंने,
कम खाकर कंजूस होते देखा है

सीधे आदमी की दीवार पर,
लिपटा  हुआ गोबर भी देखा है 
क़र्ज़ में दबे किसान को मैंने,
रोकर दुनिया छोड़ते देखा है

कल की बनी सड़क को आज,
मक्कारी से उखड़ा देखा है
भूखे बच्चे  की खाल को मैंने ,
पसलियों से चिपके देखा है

दलितों के अबोध बच्चों को,
चुपचाप शोषण सहते देखा है
ब्राह्मण के बेरोजगार बेटे को मैंने,
आरक्षण को कोसते देखा है

न चाही नवजात बच्ची को,
नाले में सड़ते देखा है
मंदिर में पाखंडी पंडों को मैंने,
भावुक भक्तों को ठगते देखा है

ट्रेन चढ़ते अवधूत को,
युवक की लात खाते देखा है
थके गरीब श्रमिक को मैंने,
रोजी के लिए गिड़गिड़ाते देखा है

इन सब ने कितने दुःख सहे,
क्रूरता में, शोषण में, गरीबी में,
भेदभाव में, भ्रष्टाचार में, झूठ में,
निर्बलता में, अभाव में, सीधेपन में,

सबके दुखों को दूर करने का,
रास्ता मैंने देखा है
मालिक का काम करने का,
अब सपना मैंने देखा है

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