पश्चिम बंगाल का नक्सलबाड़ी 1967 में शोषितों का सामंत शोषकों के खिलाफ आंदोलन सारी दुनिया के लिए एक मिसाल बना था । राज्य में कम्युनिस्ट सरकार आने के बाद अन्य राज्यों में भी फैला । कभी एक गाँव से शुरू हुआ ये आंदोलन आज आतंक का पर्याय बन चुका है । सुकमा में हमारे 25 जवानों पर कायरना हमला कोई नई घटना नहीं है । नक्सलबाड़ी आंदोलन के उस समय के जीवित नेता भी क्रांति के इस तरीके व आंदोलन की इस मतिभ्रष्टता से दुखी हैं ।
शहरों के अंदर के कॉलेज विद्यार्थी तक इनके बहकावे में आ रहे हैं कॉमरेड बन रहे हैं । आदिवासी क्षेत्रों के गरीबों में इनका अच्छा खासा प्रभाव है । इनके नेता भली भांति शिक्षित हैं जो अशिक्षित गरीब आदिवासियों को भड़काते हैं । संगठन के विस्तार में इन्हे अशिक्षित आदिवासियों की अनभिज्ञताओं का लाभ मिलता है । शहरों में पढे लिखे बेरोजगार और स्वयं को उपेक्षित महसूस करने वाले अवसादग्रस्त युवा समाज और शासन तंत्र से प्रतिशोध लेने के विचार से इनके झांसे में आ जाते हैं ।
राष्ट्र के भीतर ही राष्ट्र विरोधी मानसिकता व सशस्त्र विद्रोही राष्ट्र के लिए कैंसर हैं । इस रोग को समाप्त करने का एक ही उपाय है की बीमारी जड़ को समाप्त करना होगा । सशस्त्र विद्रोहियों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ना होगा ,जैसे भी संभव हो विश्वविद्यालयों में सक्रिय इनके तंत्र को जड़ से मिटाना होगा ,अपने गिरिवासी वनवासी वंचित वनबंधुओं को शिक्षित करना होगा और अंततः कुछ लोगों की सामंतवादी मानसिकता को समाप्त करना होगा जो इस आंदोलन की मूल उद्दीपक थी ।
शहरों के अंदर के कॉलेज विद्यार्थी तक इनके बहकावे में आ रहे हैं कॉमरेड बन रहे हैं । आदिवासी क्षेत्रों के गरीबों में इनका अच्छा खासा प्रभाव है । इनके नेता भली भांति शिक्षित हैं जो अशिक्षित गरीब आदिवासियों को भड़काते हैं । संगठन के विस्तार में इन्हे अशिक्षित आदिवासियों की अनभिज्ञताओं का लाभ मिलता है । शहरों में पढे लिखे बेरोजगार और स्वयं को उपेक्षित महसूस करने वाले अवसादग्रस्त युवा समाज और शासन तंत्र से प्रतिशोध लेने के विचार से इनके झांसे में आ जाते हैं ।
राष्ट्र के भीतर ही राष्ट्र विरोधी मानसिकता व सशस्त्र विद्रोही राष्ट्र के लिए कैंसर हैं । इस रोग को समाप्त करने का एक ही उपाय है की बीमारी जड़ को समाप्त करना होगा । सशस्त्र विद्रोहियों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ना होगा ,जैसे भी संभव हो विश्वविद्यालयों में सक्रिय इनके तंत्र को जड़ से मिटाना होगा ,अपने गिरिवासी वनवासी वंचित वनबंधुओं को शिक्षित करना होगा और अंततः कुछ लोगों की सामंतवादी मानसिकता को समाप्त करना होगा जो इस आंदोलन की मूल उद्दीपक थी ।
No comments:
Post a Comment