Wednesday, 7 January 2015

कल स्वप्न में आईं तुम

कल स्वप्न में आईं तुम 
सो रहीं थीं 
मैं खड़ा एकटक तुम्हे 
निहारता जा रहा था 
दिखने में हँसता कठोर चेहरा 
कल न जाने क्यूँ 
नरम लग रहा था 
बंद आँखों के नीचे
लाल गालों ने शायद 
उसे नरम कर दिया था 
जब तक रहा वहां 
देखता रहा तुम्हे.... 
आज क्यूँ मैं नरमी में रमा जा रहा था 
मुझे कठोरता प्रिय है 
मेरा ह्रदय कठोर है 
सब कुछ मुझे कठोर भाता है 
शायद वो तुम थीं इसलिए
मुझे वो नरम पसंद आ रहा था 
एक बार सोचा मैंने 
तुम तो ऐंसी न थीं 
मुझे अब भी क्यों भा रही हो ?
मेरा मन तुम्हारी नरमी से 
अब नरम हो गया था  
संसार पर वो क्रोध और घृणा 
अब कम हो गयी थी 
फिर एक बार लगा तुमको जगा लूँ
पर रुक गया मैं  
सोचा मन में कठोरता जो बची है 
उसे पूरी नरम हो जाने दूँ…… 

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