मानवता की परीक्षा
कैंसे हो जाते हैं लोग इस तरह निर्जीव ?....
और मैं ?
हाँ !मैं भी…
जब एक गाय सड़क पर घायल पड़ी रंभा रही होती है। हाँ वही गाय जिसे सब माता कहते हैं ,उसकी पूजन तीज-त्योहारों पर करते हैं वही आज सड़क पर पड़ी कराह रही थी।
लोग कह रहे थे कि गाय पागल है और मरने वाली है, अरे !मरने वाली है ? क्या अब उस ईश्वर का स्थान अब अज्ञानी मानव लेने जा जा रहे हैं ?क्या हक़ है हमें ऐंसी भविष्यवाणियां करने का कि सड़क पर पड़ी वो गाय अब मर जाएगी ?
कहाँ चली गई थी हमारी दयालुता, हमारा सहृदय ,हमारे प्रवचन ,हमारे धर्मशास्त्र ,हमारी परंपरा ,पूजन ,सेवा और सत्कार…?
हमारा मुख तो हमारी दयालुता की कथा बाँचता है पर समय दिखा देता है ,हमारा ह्रदय भी दिखा देता है वह कितना कोमल है और कितना कठोर है या यूँ कहें की कितना निर्दयी है ?दया उसी में तो बसती है,पंडितों के मुख से सुने हुए प्रवचन कि जीव पर दया रखनी चाहिए ,कहाँ चले गए ? और कहाँ गए हमारे धर्मशास्त्र जो कहते हैं कि गौ में सभी देवताओ का वास होता है ,वो रिवाज जिनमें हम गौ की पूजन करते हैं उसको नमस्कार करते हैं अरे! कैंसी पूजा और कैंसा सत्कार जब सुबह के भोजन में पहली रोटी निकलती गाय की है और गाय को मिलती अंत में है ?क्या गाय और मूक प्राणियों की पूजा ,सेवा और सत्कार मात्र मान्यताओं और त्योहारों तक ही सीमित है ?
इसे परंपरा का नाम देना तो उचित होगा ही नहीं क्योंकि परम्परा तो परंपरा तब होती है जब उसका निर्वहन होता है ।
सुन रहे थे कि पागल है अरे! पागल में क्या प्राण नहीं होते ? क्या मानसिक अस्वस्थता निर्जीवता का प्रतीक है ? घूमती रहती हैं गायें लावारिस ;जन जाएँ तो दुग्धलोभ के कारण लोगों की कृपादृष्टि पड़ती है और कभी-कभी तो यह कृपादृष्टि गाँव में झगड़े भी करवा देती है कि गाय पर स्वामित्व किसका है ?
छटपटा रही थी वो पड़ी थी सड़क पर घायल ,असहाय ,पीड़ित और लाचार।
उस भीड़ में क्या था ? दर्जनों युवाओं एवं कथित अनुभवी और बुद्धिजीवी वृद्धों का समूह और लोगों की बातें कि अब वो मरने वाली है ,अभी-अभी एक वाहन टक्कर मार कर चला गया है ,गाय को खून आ रहा है।
बस इन्ही बातों से लोग अपना मन बहला रहे थे। कुछ का मन ऊब गया जाने लगे किसी को कुछ काम आ गया तो किसी को कुछ। कुछ नए आए सब कुछ समझते हुए भी पूछते हैं कि क्या हुआ है ?गाय अब भी तड़प रही थी अंतर बस इतना था कि वो अब कम छटपटा रही थी ,शायद अब उसके घायल शरीर में शक्ति क्षीण हो रही थी। सड़क पर फैला गाय का रक्त अब मात्रा में अधिक बढ़ने लगा था। बातें और नया रूप लेने लगीं कि इसके मरने के बाद तुरंत इसे हटवाना होगा नहीं तो जब इसके मांस को यहाँ के अन्य पशु खा लेंगे तो वे भी पागल हो सकते हैं।
ये सब हो क्या रहा था वहां ?एक मूक प्राणी की मृत्यु की प्रतीक्षा ?
हाँ ! यही हो रहा था वहाँ।
भीड़ अब भी उतनी ही थी बस चेहरे बदलते जा रहे थे। कुछ लोग मंदिर की ओर जा रहे थे। शायद उनकी मानसिकता ये होती है कि मंदिर में भगवान् मिलते हैं। यहाँ पर एक प्रश्न और है कि ये जो सड़क पर पड़ा छटपटा रहा था ये कौन था ?
गाय के रूप में ये वही तो था जिसके मिलने की इच्छा में लोग मंदिर जाते हैं। लज्जा तो इस बात की है कि उन मंदिर जाने वालों की जमात में एक मैं भी था। किसी ने नहीं की चिंता सड़क पर पीड़ाग्रस्त पड़े इस भगवान् की।हम मंदिर जाने के लिए निकले ही थे कि उस गाय की पीड़ा भी मिट गई सदैव के लिए। उसका पीड़ा-नाट्य जिसे देखकर लोग अपना मनोरंजन कर रहे थे विलीन हो गया उसकी अंतिम श्वासों में।भगवान् भी पड़े क्या करते वहां जब लोग उन्हें मिलने की आकांक्षा में मंदिर की ओर जा रहे थे।
कहने को बहाने तो बहुत हैं कि किसी को ये काम था या किसी को वो काम था या किसी को मंदिर जाना था और कुछ बुद्धिजीवी यह भी कह देंगे कि जीवन क्षणिक है शरीर नश्वर है ,भौतिक संसार में जो भी आता है उसकी मृत्यु तो सुनिश्चित है या ये भी कहा जा सकता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत है और भी कई बातें हैं जो सफाई में कही जा सकती हैं। न विचार मंथन पर कोई परिणाम है न निष्कर्ष ,बस मन को समझाने या सांत्वना देने के कुछ बहाने हैं और कुछ नहीं है.…।
पर एक अंतिम अपरिवर्तनीय सत्य है और वो यह है कि हम हार जाते हैं ईश्वर द्वारा ली गई मानवता की परीक्षा में।
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