काश बुरे न होते !
एक पहलू और है कि इन अच्छों के अतिरिक्त कुछ ऐंसे भी है जिनकी किसी को कोई आवश्यकता नहीं होती जिन्हे दानव की श्रेणी में रखा जा सकता है लोग उनसे बचना चाहते है उनसे दूर भागते है क्योंकि ये व्यक्ति अनेकों की पीड़ा का स्रोत होते हैं यदि इन लोगों का अस्तित्व वास्तव में अन्यों के लिए कष्टकारक है तो ईश्वर ने इनका अस्तित्व क्यों बचा कर रखा हुआ है ?
सत्य तो यह है की इनकी भी उपयोगिता है कल्पना कीजिये कि यदि बुरे और बुराई न होते तो अच्छे और अच्छाई क्या मापदंड होता ? आप किसे बुरा कहते और किसे अच्छा ? क्योंकि तब सभी तो एक जैंसे थे।
निष्कर्ष ये है की प्रत्येक सांसारिक पत्र का महत्व है महत्वहीन कुछ भी नहीं है। कमी हम में है जो अच्छा महसूस होता है हम उसे अपना लेते हैं ,जो बुरा महसूस होता है उसे हम नकार देते है जबकि जो कुछ अच्छा महसूस होता है उसमें से अधिकतर वास्तव में अच्छा होता नहीं है जो बुरा महसूस होता है वही अधिकतर अच्छा होता है। इसमें किसी व्यक्ति विशेष जो ऐंसा करते हैं का दोष नहीं है इस संसार में ऐंसा होता ही है।
ध्यान रहे हम एक ऐंसे मूर्ख संसार में रहते हैं जहाँ शिष्टाचार के नाम पर प्याली में चाय छोड़ने का भी रिवाज है इस शिष्टाचार में यह नहीं सोचा जाता कि इस दुनिया में ऐंसे भी बहुत हैं जिन्हे ये भी बड़ी मुश्किल से नसीब होता है। परिवर्तन का उपाय यही है
हम सुधरेंगे ,जग सुधरेगा।
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